चीन (China) के खिलाफ अब भारत (India) ने आक्रामक रुख अपना लिया है. भारत ने तय कर लिया है कि चीन को उसी के खेल में मात देना होगा. इसलिए भारत ने अब ताइवान (Taiwan) के साथ नये रिश्तों की शुरुआत की है. बीते दिनों त्साई इंग-वेन ने ताइवान के राष्ट्रपति पद की दोबारा शपथ ली और उनके शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा के दो सांसद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये शामिल हुए. ये दो सांसद है मीनाक्षी लेखी और राहुल कस्वान.

भाजपा के सांसदों समेत 41 देशों के प्रतिनिधियों ने ताइवान की राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये शिरकत की. ये निश्चित रूप से चीन को पसंद नहीं आएगा. चीन इसलिए भड़क जाएगा क्योंकि चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और उसे स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा नहीं देता. भारत ने भी हमेशा से चीन की वन चाइना पॉलिसी का सम्मान किया और ताइवान के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित नहीं किये. चीन ताइवान और हांगकांग को एक देश दो सिस्टम के तहत अपना हिस्सा मानता है. जबकि ताइवान लम्बे अरसे से अपने स्वतंत्र पहचान के लिए छटपटा रहा है.

भारत की बदली नीति इसलिए भी चौंकाती है क्योंकि 2016 में जब त्साई ने पहली बार राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी तब मोदी सरकार ने न्योता मिलने के बावजूद अपने किसी सांसद को ताइवान नहीं भेजने का फैसला किया था. संयुक्त राष्ट्र के 194 सदस्य देशों में से 179 देशों का ताइवान के साथ राजनयिक संबंध हैं, लेकिन भारत अब तक इससे बच रहा है.

ताइवान की राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन

लेखी और कस्वान ने अपने साझे संदेश में कहा कि भारत और ताइवान लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करते हैं. संदेश में कहा गया, ‘भारत और ताइवान, दोनों लोकतांत्रिक देश हैं और स्वतंत्रता एवं मानवाधिकारों के सम्मान के साझे मूल्यों से बंधे हैं. पिछले कुछ वर्षों में भारत और ताइवान ने द्विपक्षीय रिश्तों में व्यापार, निवेश और लोगों के आपसी आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में काफी विस्तार दिया है.’

इस कदम से चीन का भड़कना स्वाभाविक था और वो भड़क भी गया. ताइवानी राष्ट्रपति को बधाई संदेश देने वाले विदेशी नेताओं की निंदा की. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग ने पेइचिंग में संवाददाताओं से कहा, ‘हमें उम्मीद और यकीन है कि (वो) ताइवान की आजादी के लिए पृथकतावादी गतिविधियों का चीन की जनता की ओर से विरोध किए जाने और राष्ट्रीय एकीकरण की मूल भावना का सम्मान करेंगे.’