जहाँ एक तरफ वामपंथ का दबदबा देश भर में सिकुड़ कर सिर्फ केरल तक रह गया है वही अगर बात करें छात्र राजनीती की तो इसमें वामपंथ का एक ऐसा गढ़ आज भी मजबूती से खड़ा है जिसे गिराना इनके विरोधियों के बूते की बात नहीं लगती है। वामपंथ का ये गढ़ हैं दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय जहाँ हर साल छात्रसंघ के चुनावों में लेफ्ट का वर्चस्व देखने को मिलता है, इस साल के चुनावों में भी कोई नई बात नहीं हुई और सभी चार सीटों पर लेफ्ट उम्मीदवारों ने जीत हासिल किया।

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जेएनयु छात्र संघ चुनाव में लेफ्ट विचारधारा से सम्बंधित आइसा, एसएफआई, एआईएसएफ और डीएसएफ की संयुक्त मोर्चा ने सभी चार पदों पर जीत दर्ज की है। लेफ्ट के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार एन साई बालाजी, उपाध्यक्ष पद के लिए लेफ्ट की सारिका चौधरी, जनरल सेक्रेटरी के लिए लेफ्ट के एजाज अहमद और ज्वॉइंट सेक्रेटरी पद के लिए लेफ्ट के अमुथा जयदीप जीते हैं।

इस साल के चुनावों में मतदान प्रतिशत 67.8 रहा जो की पिछले छह साल में सबसे अधिक है। इस चुनाव में 5,000 से अधिक छात्रों ने अपने मत का प्रयोग किया। अगर बात एबीवीपी की करें तो इस बार एबीवीपी के उम्मीदवार सभी सीटों पर दूसरा स्थान हासिल करने में कामयाब हुए। वामपंथ के गढ़ में सेंध लगाने के लिए अभी भी एबीवीपी को एक लम्बा सफ़र तय करना होगा।

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छात्र राजनीती के बाद कथित तौर पर देश विरोधी नारों और सेना के खिलाफ बयान दे कर चर्चा में आये कन्हैया कुमार ने जेएनयु के चुनाव परिणामों पर ट्वीट कर के टिप्पणी की है। कन्हैया ने अपने ट्वीट में कहा है की जेएनयू की छात्र राजनीति में हिंसा की जगह कभी नहीं रही। यहां विचारों पर बहस की जाती है और स्थापित मान्यताओं पर सवाल खड़े किए जाते हैं। इन्हीं सवालों और इसी जज्बे से डरते हैं ये मनुवादी लोग। लेकिन डर के आगे हार है और संघर्ष के आगे जीत। जेएनयू ये बात बखूबी जानता है।