राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई (Ranjan Gogoi) को राज्यसभा के लिए नामित क्या किया सियासी हंगामा मच गया. हंगामा मचना ही था क्योंकि रंजन गोगोई ने अपने साढ़े 13 महीनों के कार्यकाल में कई ऐसे फैसले सुनाये जो लिबरल गैंग और विपक्ष को नागवार गुजरा था. राफेल विवाद, असम NRC और अयोध्या जैसे ऐतिहासिक फैसले सुनाने के बाद से ही रंजन गोगोई लिबरल गैंग और विपक्ष के निशाने पर थे. इसलिए जैसे ही उन्हें राज्यसभा के लिए नामित करने की खबर आई इसे इनाम बताया जाने लगा.

लेकिन रंजन गोगोई को राज्यसभा भेजने पर इतना शोर क्यों मच रहा है? रंजन गोगोई को भाजपा ने नहीं बल्कि रष्ट्रपति ने नामित किया है और राष्ट्रपति के पास अधिकार है वो 12 सदस्यों को मनोनीत कर सके. और फिर ये कोई पहली बार तो नहीं हुआ कि इसपर इतना हंगामा मच गया. इस परंपरा की शुरुआत तो कांग्रेस ने ही की थी. अगर याद नहीं तो याद कीजिये पूर्व चीफ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को. अगर याद नहीं आ रहा तो याद दिलाता हूँ आपको.

साल 1984 का नंबर महीना, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद दिल्ली में सिख विरोधी दंगों के दौरान हज़ारों सिखों का कत्लेआम किया गया. तब इंदिरा गाँधी के बेटे राजीव गाँधी ने कहा था ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है.’

उसके बाद राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने. रंगनाथ मिश्रा कमिटी का गठन हुआ. रंगनाथ मिश्रा उन दिनों सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश थे. जांच के नाम पर रंगनाथ मिश्रा कमिटी ने कई कमिटियों का गठन किया. मिश्रा ने अगस्त 1986 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, और फरवरी 1987 में रिपोर्ट सार्वजनिक की गई. रिपोर्ट में कांग्रेस को क्लीन चिट देते हुए इसका सारा दोष दिल्ली के तत्कालीन उप राज्यपाल तथा पुलिस कमिश्नर के मत्थे मढ दिया था. लेकिन तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट पर सदन में चर्चा की इजाज़त नहीं दी. साल 1994 में साक्ष्यों के अभाव में दिल्ली सरकार ने इस मामले को बंद कर दिया.

रंगनाथ मिश्रा को मिला इनाम

रंगनाथ मिश्र की उसी रिपोर्ट के बाद से उनके करियर को मानो पंख लग गया था. 1990 में वो चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया बने. वो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पहले चेयरमैन भी बने. फिर बाद में कांग्रेस ने उहे 1998 में राज्यसभा भी भेजा. चीफ जस्टिस को रिटायर्मेंट के बाद राज्यसभा भेजने की परंपरा तो कांग्रेस ने ही शुरू की.

जस्टिस बहारुल इस्लाम

बहारुल इस्लाम 1962 से 1972 तक कांग्रेस की तरफ से राज्यसभा के सदस्य थे. उसके बाद उन्हें गुवाहाटी हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस बना कर भेजा गया. वो गुवाहाटी हाई कोर्ट से ही बतौर चीफ जस्टिस 1980 में रिटायर हुए. रिटायर्मेंट के बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट में 1980 में ही सुप्रीम कोर्ट में जज बना कर भेजा गया. शायद ये पहला ऐसा मामला था कि एक रिटायर जज को सुप्रीम कोर्ट का जज बना कर भेजा गया. उसक बाद उन्होंने 1984 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट से लड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज के पद से इस्तीफ़ा दिया. फिर उन्हें 1983 में ही कांग्रेस ने राज्यसभा भेजा.

जज जैसे संवैधानिक पद का जैसा इस्तेमाल कांग्रेस ने किया है उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है. लेकिन दूसरों पर उंगली उठाने से पहले वो अपना इतिहास भूल गई.