अब से करीब चार महीने पहले महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ सरकार बनाकर कांग्रेस ने अपने खाते में एक राज्य जोड़ा था. लेकिन अब उसके हाथ से मध्य प्रदेश छीन कर भाजपा ने उससे बदला ले लिया है. मध्य प्रदेश में न सिर्फ सत्ता कांग्रेस के हाथों से फिसली बल्कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे कद्दावर नेता भी साथ छोड़ गए और आलाकमान बस ताकते रह गया.

लेकिन कांग्रेस की परेशानी सिर्फ मध्य प्रदेश नहीं है. राजस्थान (Rajasthan) में भी वही हालात हैं जो मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में हैं. राजस्थान में भी सचिन पायलट (Sachin Pilot) गुट और अशोक गहलोत गुट आमने सामने है. सचिन पायलट गुट वाले विधायक लम्बे वक़्त से अशोक गहलोत से असंतुष्ट है. उनकी शिकायत है कि सरकार में उनकी नहीं सुनी जाती और उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है. मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जो कदम उठाया उसे देख राजेश पायलट भी कुछ ऐसा ही कदम उठा सकते हैं. ऐसे में कांग्रेस के सामने अपना राजस्थान का किला बचाने की चुनौती होगी.

मध्य प्रदेश में सियासी उथल-पुथल के बीच सोनिया गांधी ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को दिल्ली बुलाया है. कांग्रेस नहीं चाहती है कि इस तरह की स्थिति राजस्थान में भी बने. 200 विधानसभा सीटों वाले राजस्थान में कांग्रेस के पास 100 विधायक हैं. इसके अलावा बीएसपी को 6, सीपीएम को 2, आरएलडी को 1, आरएलपी को तीन और निर्दलीयों को 13 सीटों पर जीत मिली थी. अन्य सहयोगियों को मिलाकर कांग्रेस के पास 107 विधायक हैं. 13 में से 12 निर्दलीय विधायक कांग्रेस के साथ और एक बीजेपी के साथ है. बीजेपी के पास अपनी 72 सीटें हैं. ऐसे में अगर निर्दलीय विधायकों के साथ कांग्रेस के भी कुछ विधायक टूट जाएं तो राजस्थान की सरकार पर भी संकट के बादल मंडरा सकते हैं.

पायलट राजस्थान की अपनी ही सरकार पर कई बार निशाना साध चुके हैं. वह ये भी कह चुके हैं कि सत्ता में कार्यकर्ताओं की भागीदारी नहीं है. अब मध्य प्रदेश गँवा चुकी कांग्रेस राजस्थान को किसी भी कीमत पर बचाना चाहती है.