1669 में औरंगजेब के फरमान के बाद मुगल सेना ने हमला कर बनारस (Varanasi) के आदि विशेश्वर (Kashi Vishvanath Temple) का मंदिर को ध्वस्त किया था. इस बात को किसी भी प्रमाण की आवश्यकता नहीं. क्योंकि जब आप कासी विश्वनाथ मंदिर में दर्शनों के लिए गए होंगे तो मंदिर से लगती ज्ञानवापी मस्जिद को जरूर देखा होगा और देखा होगा प्राचीन विश्वनाथ मंदिर के अवशेष. नंदी की प्रतिमा आज भी प्राचीन विश्वनाथ मंदिर (ज्ञानवापी मस्जिद) की तरफ है.

अब 352 साल बाद पौराणिक ज्ञानवापी कूप और ज्ञानवापी परिसर में स्थित विशाल नंदी काशी विश्वनाथ मंदिर का हिस्सा बन गया है. मंदिर के परिक्रमा मंडप के भीतर ही अब भक्त काशी विश्वनाथ के दर्शन के साथ ही ज्ञानवापी कूप का पूजन भी कर सकेंगे.

1669 में औरंगजेब के फरमान के बाद जब मुगल सेना ने हमला कर आदि विशेश्वर का मंदिर ध्वस्त किया था तो  ज्योतिर्लिंग को कोई क्षति न हो इसके लिए मंदिर के महंत शिवलिंग को लेकर ज्ञानवापी कुंड में कूद गए थे. मुगल हमले के बाद पुजारियों ने ज्ञानवापी परिसर के बगल में दोबारा शिवलिंग की स्थापना कर पूजा पाठ शुरू की. तब से ज्ञानवापी कूप और नंदी काशी विश्वनाथ मंदिर से बाहर हो गए थे. वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्याबाई ने 1780 में कराया था. अब 352 साल बाद दोबारा इतिहास दोहराया है और पौराणिक ज्ञानवापी कूप और विशाल नंदी मंदिर का हिस्सा बन गया है.